रेलवे मैनुअल का उल्लंघन कर रहा रेलवे विभाग

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कुलदीप रावत

 

राजधानी देहरादून के रेलवे स्टेशन मैं भाषा बदलाव को लेकर स्वयं रेलवे विभाग अपने ही रेलवे मैनुअल का उल्लंघन कर रहा है
रेलवे विभाग का मैनुअल का नियम कहता है कि किसी भी राज्य की स्थानीय द्वितीय भाषा को उस रेलवे स्टेशन के बोर्ड पर लिखना अनिवार्य होगा लेकिन अब रेलवे विभाग अपने ही नियमों की धज्जियां उड़ाने में लगा हुआ है
पिछले माह जनवरी के महीने रेलवे विभाग के अधिकारियों के द्वारा स्वयं ही राजधानी देहरादून के रेलवे के भाषा को लेकर एक पत्र जारी किया गया था यह पत्र उत्तराखंड के रेलवे स्टेशनों से लगने वाले तमाम जिलों के जिलाधिकारियों को भी प्रेषित किया गया था जिस पत्र में जिलाधिकारियों से उनके रेलवे स्टेशनों के संस्कृत में शुद्ध उच्चारण मांगा गया था राजधानी देहरादून के तत्कालीन जिलाधिकारी सी रविशंकर के द्वारा देहरादून का संस्कृत में अनुवाद करके रेलवे विभाग को उपलब्ध करा दिया गया था सबसे हैरान करने वाली बात यह है रेल विभाग के द्वारा राजधानी देहरादून के रेलवे स्टेशन पर संस्कृत में देहरादूनम नाम लिख भी दिया गया था लेकिन रेलवे उच्च अधिकारियों के द्वारा कुछ समय बाद ही दिन संस्कृत भाषा में देहरादूनम नाम हटाकर फिर उर्दू में लिख दिया गया  जिसके बाद उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा संगठनों के द्वारा संस्कृत नाम हटाने को लेकर विरोध भी किया गया और इस संबंध में संस्कृत शिक्षक संगठनों ने रेलवे विभाग को ज्ञापन भी प्रस्तुत किया वही इस संबंध में जब देहरादून रेलवे स्टेशन के निदेशक से पूछा गया तो उन्होंने उच्च अधिकारियों के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारियों के द्वारा धार्मिक सामंजस्य बिठाने को लेकर यह फैसला लिया गया है इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया यह रेलवे मैनुअल नियम का उल्लंघन है लेकिन जल्द ही राज्य सरकार और जिला अधिकारी के द्वारा इस मामले में रास्ता निकाला जाएगा
वहीं राजधानी देहरादून के रेलवे स्टेशन में संस्कृत में नाम हटाने को लेकर संस्कृत विभाग के निदेशक से जब उनकी  राय पूछी गई तो उन्होंने संस्कृत भाषा को सर्वश्रेष्ठ भाषा का दर्जा देते हुए कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है और सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत का सम्मान जरूर होना चाहिए उन्होंने रेलवे स्टेशन में संस्कृत में देहरादून शब्द को हटाने को लेकर अपनी निजी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देहरादून रेलवे स्टेशन में संस्कृत में भी देहरादून का नाम होना चाहिए इसके साथ ही उन्होंने संस्कृत और उर्दू को मां और मौसी का दर्जा देते हुए कहा कि उत्तराखंड में संस्कृत हमारी द्वितीय भाषा है और इस भाषा का सम्मान करना सभी का कर्तव्य है

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