उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य में मैदानी एवं पहाड़ी के आधार पर किया जा रहा भेदभाव

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उधमसिंह नगर: उत्तराखंड राज्य बने लगभग 20 वर्ष का समय हो गया है। उत्तराखंड राज्य में 35 प्रतिशत आबादी पर्वतीय क्षेत्र अर्थात पहाड़ के निवास करने वाले लोगों की है और लगभग 65 प्रतिशत आबादी मैदानी क्षेत्र की है। हालांकि मैदानी क्षेत्र में केवल जनपद उधम सिंह नगर, हरिद्वार एवं देहरादून आते हैं और देहरादून क्षेत्र में भी लगभग आधी आबादी पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की है तथा आधी आबादी मैदानी क्षेत्र के लोगों की यानी लगभग ढाई जिलों में ही मैदानी क्षेत्र के लोग निवास करते हैं।

राज्य बनने के बाद इस दौरान उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राजनीतिक दलों की सरकारें रही हैं। राज्य में सरकार किसी भी दल की हो लेकिन पूरे राज्य में शासन-प्रशासन, सरकार पर कब्जा पूरी तरह से पर्वतीय क्षेत्र के लोगों का ही रहा है। जिसमें मैदानी क्षेत्र के लोगों के साथ क्षेत्रवाद के आधार पर निरंतर भेदभाव किया जा रहा है।

उत्तराखण्ड राज्य में पहाड़ और मैदान के क्षेत्र के आधार पर किस तरह भेदभाव किया जा रहा है इस पर एक नजर डालते हैं…

  • उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से इस राज्य में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनैतिक दलों की सरकारें रही हैं। इन दोनों राजनीतिक दलों में प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ पदों पर हमेशा ही पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की तैनाती की गई है। मैदानी क्षेत्र के किसी जनप्रतिनिधि को प्रदेश स्तर पर दोनों ही राजनैतिक दलों द्वारा कोई पद कभी नहीं दिया गया है।
  • उत्तराखंड राज्य में 5 लोकसभा सीटें हैं। जिसमें राज्य बनने के बाद से कभी भी किसी भी मैदानी क्षेत्र के व्यक्ति को सांसद के रूप में भाजपा और कांग्रेस द्वारा चुनाव लड़ने का अवसर नहीं दिया गया है। सदैव ही भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों से पर्वतीय क्षेत्र को टिकट देकर मैदानी क्षेत्र के लोगों के साथ भेदभाव की राजनीति की गई है। उत्तराखंड राज्य में वर्तमान में भी सभी पांचों सांसद पर्वतीय क्षेत्र के हैं, इससे पूर्व भी पांचों सांसद पर्वतीय क्षेत्र के ही थे।
  • उत्तराखंड राज्य में कुल 13 जिले हैं, जिसमें देहरादून का आधा जिला व हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर जिला जो मैदानी क्षेत्र माने जाते हैं इसके अलावा अन्य 10 जनपदों में कभी भी किसी मैदानी क्षेत्र के व्यक्ति को विधायक के रुप में चुनाव लड़ने के लिए भाजपा और कांग्रेस या किसी भी अन्य दल द्वारा टिकट नहीं दी गई। इन सभी 10 जनपदों में केवल पर्वतीय क्षेत्र के व्यक्तियों को ही विधायक के रूप में चुनाव लड़ने के लिए टिकट दी जाती रही है, जबकि उधम सिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून के आधे जनपद जिसमें मैदानी क्षेत्र के बहुसंख्यक लोग निवास करते हैं मैं पर्वतीय क्षेत्र के व्यक्तियों को विधायक के रूप में चुनाव लड़ने के लिए टिकट दी जाती है , इसका यह उदाहरण स्पष्ट है कि हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जनपद में आज भी आधे से ज्यादा विधायक पर्वतीय क्षेत्र के हैं।
  • उत्तराखंड में एक दो को छोड़ कर सभी कैबिनेट मंत्री अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र के हैं और वरिष्ठता के बावजूद मैदानी क्षेत्र के विधायकों को भाजपा और कांग्रेस सरकार द्वारा कैबिनेट मंत्री पद से वंचित रखकर पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को कैबिनेट में प्राथमिकता दी जाती रही है और वर्तमान स्थिति भी यही है।
  • राज्य में हरिद्वार, देहरादून और जनपद उधमसिंह नगर में कोई भी सरकारी नौकरी के लिए वैकेंसी कभी नहीं निकाली गई, जो भी नियुक्तियां की जाती हैं वह पर्वतीय क्षेत्र के जनपदों में नियुक्तियां कर उनको स्थानांतरित करते हुए जनपदों में ट्रांसफर किया जाता है। उसके उपरांत पर्वतीय क्षेत्र में पुनः नियुक्ति के लिए पद रिक्त दिखा दिए जाते हैं।
  • राज्य में पुलिस विभाग में 90 से 95% पदों पर पर्वतीय क्षेत्र के लोग नौकरी कर रहे हैं। जिसमें कॉन्स्टेबल, सब इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर से लेकर बड़े-बड़े पदों पर पर्वतीय क्षेत्र के लोग नियुक्त हैं जबकि मैदानी क्षेत्र के पांच से दस प्रतिशत लोग है और वह भी राज्य बनने से पूर्व से नियुक्त हैं। यदि आप किसी कार्य से किसी मैदानी क्षेत्र के किसी पुलिस थाने में जाते हैं तो वहां नियुक्त सभी पुलिस कर्मचारी आपको पर्वतीय क्षेत्र के ही मिलेंगे और आपको पर्वतीय क्षेत्र और मैदानी क्षेत्र के आधार पर भेदभाव की कार्यशैली स्पष्ट देखने को मिलेगी।
  • राज्य में पुलिस विभाग के अलावा राजस्व विभाग, नगर पालिका, नगर निगम शासन-प्रशासन के प्रत्येक कार्यालय में नब्बे प्रतिशत पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की नियुक्ति और उनके द्वारा मैदानी क्षेत्र के लोगों के कार्यों में भेदभाव की कार्यशैली स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।
  • राज्य में पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को मूल निवास प्रमाण पत्र जारी किया जाता है जबकि मैदानी क्षेत्र के लोगों को स्थाई निवास प्रमाण पत्र के लिए भी 15 वर्ष पुराना रिकॉर्ड मांगा जाता है।
  • राज्य में पर्वतीय क्षेत्र का व्यक्ति कोई भी संपत्ति व कृषि भूमि खरीद सकता है लेकिन मैदानी क्षेत्र के व्यक्ति को यदि उसके पास पूर्व में कोई कृषि भूमि नहीं है, तो भले ही उसका जन्म उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत हुआ है, उसके पिता का जन्म, उसके दादा का जन्म उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत हुआ है, फिर भी उसे कृषि भूमि खरीदने का अधिकार नहीं दिया गया है वह केवल ढाई सौ वर्ग मीटर का आवासीय प्लॉट ही खरीद सकता है और वह भी वर्ग 1ग विशेष श्रेणी के अंतर्गत दर्ज होगी और उसे संक्रमणीय अधिकार के अंतर्गत स्वामित्व नहीं दिया जाता।
  • राज्य में क्षेत्रवाद के आधार पर भेदभाव का एक नया उदाहरण यह भी है कि उधम सिंह नगर जनपद के तहसील बाजपुर क्षेत्र के अंतर्गत किसानों की लगभग 6000 एकड़ भूमि को मुख्यमंत्री द्वारा राज्य सरकार की संपत्ति घोषित कराते हुए इस भूमि को खरीदने बेचने पर जिलाधिकारी उधम सिंह नगर द्वारा रोक लगा दिए जाने का आदेश दे दिया गया है। लोगों में चर्चा इस बात की भी है कि पर्वतीय क्षेत्र के 400 परिवारों को बाजपुर क्षेत्र में किसानों से बिना अधिग्रहण के 50 वर्ष से चले आ रहे हैं कब्जे को हटाते हुए 6000 एकड़ भूमि राज्य सरकार की भूमि में सम्मिलित कर पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को यहां बसाया जाएगा।

राज्य में क्षेत्रवाद के आधार पर किये जा रहे इस भेदभाव को हटाने के लिए सभी मैदानी क्षेत्र के लोगों को आगे आकर आवाज उठानी चाहिए। वह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो उसे इस क्षेत्रवाद की राजनीति का विरोध दर्ज कराते हुए अपने स्वयं के लिए और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए विरोध दर्ज कराना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्र के लोगों के अधिकारों का हनन किए जाने के संबंध में सभी राजनैतिक दलों के केंद्रीय स्तर पर स्थित प्रतिनिधियों को भी अवगत कराना चाहिए।

मैदानी जिलों में निवास करने वाली लाखों की जनता के साथ इस भेदभाव को रोकने के लिए देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से अनुरोध करना चाहिए कि उत्तराखंड राज्य में उत्तर प्रदेश राज्य के कुछ मैदानी क्षेत्र के जनपदों को सम्मिलित कर पर्वतीय और मैदानी क्षेत्र की संख्या को समान रूपमें कर दिया जाए या उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र के जनपदों को वापस उत्तर प्रदेश में सम्मिलितज्ञापन देने वालों में मुख्य रूप से संस्थापक सौरव गंगवार,जिला अध्यक्ष ममता राठौर,कमलेश गंगवार, श्रम प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष धीरेंद्र वर्मा,कुमाऊं अध्यक्ष तारामती,रजत,बबलू गंगवार,अंजलि राठौर आदि लोग उपस्थित थे।

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