उत्तराखंड की सृष्टि की फिल्म “एक था गांव” को मिली इंडिया गोल्ड श्रेणी में जगह

0
18

देहरादूनः उत्तराखंड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो उसमें वह अपना मुकाम हासिल कर रहे हैं। इन्हीं में से एक नाम है सृष्टि लखेड़ा जो कि, उत्तराखंड के टिहरी जिले के सेमला गांव की रहने वाली है। गांव के जीवन पर आधारित उन्होंने एक फिल्म बनाई है, ‘एक था गांव’ (वंस अपॉन ए विलेज), जिसने मुंबई एकेडमी ऑफ मूविंग इमेज (मामी) फिल्म महोत्सव के इंडिया गोल्ड श्रेणी में जगह बनाई है।

यह फिल्म गढ़वाली और हिंदी भाषा में बनी है। इस फिल्म में घोस्ट विलेज (पलायन से खाली हो चुके) की कहानी है। सृष्टि की फिल्म का मुकाबला विभिन्न भाषाओं की चार फिल्मों के साथ है। पहले मुंबई फिल्म महोत्सव का आयोजन इसी महीने होना था लेकिन, कोविड संकट के चलते इसका आयोजन अगले साल होगा।

मूल रूप से विकास खंड कीर्तिनगर के सेमला गांव की रहने वाली सृष्टि का परिवार ऋषिकेश में रहता है। वह पिछले 10 सालों से फिल्म लाइन के क्षेत्र में हैं। उत्तराखंड में पलायन की पीड़ा को देखते हुए सृष्टि ने पावती शिवापालन के साथ (सह निर्माता) फिल्म बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने अपने गांव का चयन किया। सृष्टि बताती है कि पहले उनके गांव में 40 परिवार रहते थे और अब पांच से सात लोग ही बचे हैं। गांव वालों को किसी न किसी मजबूरी से गांव छोड़ना पड़ा है। इसी उलझन को उन्होंने एक घंटे की फिल्म के रूप में पेश किया है।

हालांकि गांव का जीवन बहुत कठिन है। एक था गांव फिल्म के दो मुख्य पात्र हैं। 80 वर्षीय लीला देवी और 19 वर्षीय किशोरी गोलू। फिल्म की कहानी भी इन दोनों के ईर्द गिर्द घूमती रहती है। लीला गांव में अकेली रहती है। इकलौती बेटी की शादी हो चुकी है। बेटी साथ में देहरादून चलने के लिए जिद करती है लेकिन, लीला हर बार मना कर देती है। वह गांव नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि, उसे गांव का जीवन अच्छा लगता है। वहीं दूसरी पात्र गोलू को गांव के जीवन में भविष्य नहीं दिखता है।

वह भी अन्य लड़कियों की तरह अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है। एक दिन ऐसी परिस्थिति आती है, कि दोनों को गांव छोड़ना पड़ता है। लीला देवी अपनी बेटी के पास देहरादून चली जाती है जबकि, गोलू उच्च शिक्षा के लिए ऋषिकेश चली जाती है। फिल्म के माध्यम से बताया गया कि अपनी जन्मभूमि को छोड़ने का कोई न कोई कारण होता है लेकिन, गांव छोड़ने के बाद भी लोगों के मन में गांव लौटने की कश्मकश चलती रहती है।

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here